साँसों की माला पे सिमरूं मैं…!
यह भजन “साँसों की माला पे सिमरूँ मैं” एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण रचना है, जो प्रेम और भक्ति के अद्भुत संगम को दर्शाती है।
इसमें भक्त अपनी हर साँस में अपने प्रियतम प्रभु का स्मरण करने की भावना व्यक्त करता है। यह गीत उस अनन्य प्रेम का प्रतीक है, जहाँ सांस-सांस में ईश्वर का नाम बसता है, और मन सांसारिक मोह से मुक्त होकर केवल भक्ति में लीन हो जाता है।
इस भजन की हर पंक्ति आत्मिक समर्पण, प्रेम की गहराई और भक्ति के सौंदर्य को सजीव कर देती है, जो सुनने वाले के हृदय को स्पंदित कर जाती है।
॥ साँसों की माला पे सिमरूँ मैं ॥
साँसों की माला पे
सिमरूँ मैं पि का नाम
साँसों की माला पे
सिमरूँ मैं पि का नाम
प्रेम के पथ पे चलते चले
हो गयी मैं बदनाम
साँसों की माला पे
सिमरूँ मैं पि का नाम ॥ १ ॥
जीवन का सिंगार है प्रीतम
मांग का है सिन्दूर
मांग का है सिन्दूर
जीवन का सिंगार है प्रीतम
मांग का है सिन्दूर
मांग का है सिन्दूर
प्रीतम की नज़रूँ से
गिर के है जीना किस काम
साँसों की माला पे
सिमरूँ मैं पि का नाम ॥ २ ॥
आआ आआ आआ आआ आआ
आआ आआ आआ आआ आआ
आआ आआ आआ आआ आआ
ढांप लिया पलकों में तुझको
बंद कर लिए नैं
बंद कर लिए नैं
ढांप लिया पलकों में तुझको
बंद कर लिए नैं
बंद कर लिए नैं
तू मुझको मैं तुझको देखूं
गैरों का क्या काम
साँसों की माला पे
सिमरूँ मैं पि का नाम ॥ ३ ॥
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