यह भजन “वृंदावन का मोर बनू, गाऊँ मैं तो राधे राधे” भक्ति और प्रेम से ओतप्रोत एक सुंदर रचना है जो भक्त के मन में राधा-कृष्ण के प्रति समर्पण और आत्मिक आनंद की भावना को प्रकट करती है।
इसमें भक्त की इच्छा व्यक्त होती है कि वह वृंदावन के मोर की तरह बनकर श्रीकृष्ण और राधारानी की सेवा में लीन हो जाए, उनके नाम का संकीर्तन करे और उनके चरणों में जीवन व्यतीत करे।
प्रत्येक पंक्ति राधे-श्याम के दिव्य प्रेम और ब्रज की माधुर्य भावना से भरी हुई है, जो सुनने वाले के मन को शांति और भक्ति से भर देती है।
॥ वृंदावन का मोर बनू,
गाऊँ मैं तो राधे राधे ॥
वृंदावन का मोर बनू,
गाऊँ मैं तो राधे राधे ॥ 1 ॥
मोर बनइयो तो बनइयो वृंदावन का,
नाच नाच श्याम को रिझाऊ,
गाऊँ मैं तो राधे राधे ॥ 2 ॥
कोयल बनइयो तो बनइयो बरसाने की,
कु कु श्री राधे जी रिझाऊँ,
गाऊँ मैं तो राधे राधे ॥ 3 ॥
गउएं बनइयो तो बनइयो गोवर्धन की,
परिकर्मा खूब लगाऊँ,
गाऊँ मैं तो राधे राधे ॥ 4 ॥
सखियाँ बनइयो तो बनइयो गोकुल की,
श्याम संग रास रचाऊँ,
गाऊँ मैं तो राधे राधे ॥ 5 ॥







